बेसिक से लेकर हायर एजुकेशन तक के फॉर्मेट में लंबे समय से बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। मोदी सरकार से देशवासियों को काफी उम्मीदें हैं। इन उम्मीदों की कसौटी पर खरा उतरने के लिए

बेसिक से लेकर हायर एजुकेशन तक के फॉर्मेट में लंबे समय से बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। मोदी सरकार से देशवासियों को काफी उम्मीदें हैं। इन उम्मीदों की कसौटी पर खरा उतरने के लिए सरकार ने पहल भी शुरू कर दी है। अपने दस सूत्री एजेंडे में उन्होंने एजुकेशन को भी प्रिऑरिटी दी है। देश के एजुकेशन में क्या-क्या खामियां हैं? सिस्टम में किन-किन बदलावों की जरूरत है ? कुछ एक्सप‌र्ट्स से बातचीत के आधार पर पेश है यह एनालिसिस..

वैल्यू-बेस्ड हो एजुकेशन

एजुकेशन मतलब सिर्फ किताबी जानकारी नहींहोना चाहिए। पूर्व आईपीएस किरण बेदी कहती हैं, एजुकेशन चार तरह के होते हैं, पर्सनल, प्रोफेशनल, वैल्यू-बेस्ड और सोशल। आजकल स्कूलों में प्रोफेशनल एजुकेशन दिया जाता है। वैल्यू-बेस्ड और सोशल एजुकेशन आपको एक अच्छा नागरिक बनाती है। एक परफेक्ट सिटीजन के लिए इन चारों की तरह की शिक्षा जरूरी है। टीचर्स को इस तरह ट्रेन करने की जरूरत है कि वह अपने स्टूडेंट्स को सोशल लीडर्स बना सकें, उनका भविष्य निर्माण कर सके।

पहले करप्शन पर दें ध्यान

पूर्व सीबीआइ चीफ जोगिंदर सिंह कहते हैं, एजुकेशन हो या कोई और डिपार्टमेंट, पूरे सिस्टम में करप्शन फैला हुआ है। सरकार को पहले करप्शन हटाने के लिए कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि इसकी वजह से योजनाएं तो अच्छी-अच्छी बनती हैं, लेकिन उनका फायदा आम आदमी नहीं उठा पाता। एजुकेशन के साथ भी यही है। सवाल ये है कि कोई चेक करने वाला होना चाहिए कि जो पैसा गया, वहां यूज हुआ कि नहीं।

टीचर्स निभाएं अपनी जिम्मेदारी

सीबीएसइ के चेयरमैन विनीत जोशी कहते हैं, शिक्षा का पूरा दारोमदार एक टीचर पर डिपेंड करता है। हमारे यहां अभी ट्रेंड और एकेडमिक ओरियंटेड टीचर्स की बहुत कमी है। आज टीचर्स में डेडिकेशन की कमी है। जरूरी है कि एक सिस्टम डेवलप किया जाए, जिसमें टीचर्स को कुछ जिम्मेदारी दी जाए। स्टूडेंट को एक शिक्षित नागरिक बनाने के साथ-साथ इस काबिल भी बनाना कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके इन सबकी जिम्मेदारी टीचर की होती है।

टीचर्स में हो डेडिकेशन

एनसीइआरटी के पूर्व डायरेक्टर जेएस राजपूत मानते हैं कि गवर्नमेंट स्कूलों में आज भी मूलभूत सुविधाओं की काफी कमी है। आज भी बहुत सी लड़कियां स्कूल जाना सिर्फ इसलिए छोड़ देती हैं कि वहां टॉयलेट की फैसेलिटी नहीं होती है। स्कूलों में टीचर्स ऐसे होने चाहिए कि स्टूडेंट्स उन्हें अपना रोल मॉडल समझें। स्कूलों में सुधार के लिए जरूरी है कि टीचर्स पंक्चुअल हों। इसके अलावा सिलेबस में भी हर पांच साल में चेंज जरूरी है।

स्कूलों को एडॉप्ट करें कंपनियां

ग्रेटर नोएडा के जीएल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ऐंड मैनेजमेंट के वाइस चेयरमैन

पंकज अग्रवाल कहते हैं, मेरा अपना मानना है कि देश में शिक्षा की बदतर स्थिति को सुधारने के लिए सिर्फ सरकार के भरोसे रहना ही ठीक नहीं है। इसके लिए कॉरपोरेट कंपनियों और प्राइवेट कॉलेजों/यूनिवर्सिटीज को कम से कम एक गांव में जाकर वहां के स्कूल गोद लेने की पहल करनी चाहिए और उसके संचालन, सुधार और विकास पर आने वाला खर्च खुद उठाना चाहिए। वहीं कनाडा के फ्रेडहट्न में साइंटिस्ट डॉक्टर आर पी सिंह उत्तरप्रदेश के अंबेडकरनगर जिले के रहने वाले हैं। अपने जिले में उन्होंने कई स्कूलों गोद ले रखा है। वह कहते हैं, हमने पश्चिमी देशों से वहां का रहन-सहन तो बहुत सीख लिया, पिज्जा-बर्गर खाने से लेकर छोटे कपड़े भी पहनने लगे, लेकिन जिन चीजों को वाकई फॉलो करने की जरूरत है, उन पर कभी ध्यान नहींदिया, उनमें से एक एजुकेशन सिस्टम भी है। यहां बड़ी-बड़ी कंपनियां और बड़े-बड़े कॉरपोरेट घराने खुलकर सामने आते हैं और सरकारी स्कूलों को अनुदान देते हैं या एडॉप्ट कर लेते हैं, भारत में भी इस चीज को बढ़ावा देना होगा।

एंप्लॉएबल हो एजुकेशन

करियर काउंसलर अनिल सेठी कहते हैं, इस समय एजुकेशन सिस्टम असलियत से कोसों दूर है। सिर्फ किताबी ज्ञान दिया जा रहा है, जिसका यूज जॉब में नहीं होता। प्राइवेट कॉलेज या इंस्टीट्यूट्स जॉब ओरिएंटेड कोर्स करा तो रहे हैं, लेकिन उनके द्वारा कराए जाने वाले कोर्सेज के बारे में गांव और छोटे शहरों के स्टू्डेंट्स को न ही पता चल पाता है और न ही भरोसा हो पाता है। 8वीं-10वीं के बाद ही यह तय हो जाना चाहिए कि स्टूडेंट्स को किस दिशा में बढ़ना है। ड्रीम विद डीजे कंपनी के डायरेक्टर दीपक जिंदल भी मानते है कि एजुकेशन जॉब ओरिएंटेड हो। जब वे किसी कॉलेज में कैंपस सेलेक्शन के लिए जाते हैं, तो यही देखते हैं कि कैंडिडेट कितना कॉन्फिडेंट है और ऑर्गेनाइजेशन को कितना फायदा पहुंचा सकता है। कैंडिडेट की बॉडी लैंग्वेज, उसकी टेक्निकल स्किल्स और एजुकेशन को सलेक्शन का क्राइटेरिया माना जाता है।

एग्जाम का डर जरूरी

दिल्ली में एजुकेशन विभाग में डिप्टी डायरेक्टर रह चुके डॉ. आर.ए.यादव मानते हैं कि एजुकेशन एक टू वे प्रोसेस होता है। टीचर पूरी ईमानदारी और डेडिकेशन के साथ अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं। इन दिनों स्टूडेंट्स की ही पढ़ाई में दिलचस्पी कम सी हो गई है। इसकी एक वजह बोर्ड एग्जाम का डर खत्म होना भी कहा जा सकता है। दसवीं या बारहवीं की बोर्ड परीक्षा के क्वैश्चन पेपर पहले से कहीं ज्यादा सरल हो जाने से बच्चों को नंबर तो काफी अच्छे आ रहे हैं, लेकिन एजुकेशन की क्वालिटी घट गई है।

नजरिया बदलने की जरूरत

दिल्ली के एलकॉन इंटरनेशनल स्कूल के प्रिसिंपल अशोक पांडेय बताते हैं, पैरेंट्स की आकांक्षाएं बढ़ने से प्राइवेट स्कूलों में अपने बच्चों के एडमिशन के लिए होड़ मची रहती है। इसकी वजह है एजुकेशन के मॉडर्न स्टाइल को समय-समय पर एडॉप्ट करते रहना, ताकि स्टूडेंट्स को अपटूडेट रख सकें। इसके उलट सरकारी स्कूलों में बेसिक चीजों तक का अभाव है। हफ्ते भर में 4-5 दिन ही टीचर आते हैं और जो आते भी हैं, वे समय पर नहीं आते। यही कारण है कि कोई भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजकर उनका भविष्य खराब नहीं करना चाहता। दिल्ली के जामा मस्जिद के सर्वोदय ग‌र्ल्स स्कूल नंबर 1 की प्रिंसिपल सीमा सक्सेना मानती हैं कि बमुश्किल 2 फीसदी पैरेंट्स ही अपने बच्चों की पढ़ाई और उनके प्रोग्रेस को लेकर गंभीर होते हैं। इससे टीचर्स को ही पैरेंट्स की भी भूमिका निभानी पड़ती है। इसके अच्छे नतीजे भी आते हैं। आज दिल्ली के सरकारी स्कूलों के बच्चे भी 90 परसेंट तक मा‌र्क्स ला रहे और दिल्ली यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स जैसे सब्जेक्ट्स में ग्रेजुएशन तक कर रहे हैं। ऐसे में जरूरत सिर्फ लोगों के नजरिए में बदलाव लाने की है। यूपी के बलिया जिले में इंद्रासिनी देवी जूनियर सेकेंडरी ग‌र्ल्स स्कूल की प्रिंसिपल शकुंतला सिंह को बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए बहुत कोशिशें करनी पड़ती है। वह बताती हैं, तमाम जागरुकता कार्यक्रमों के बावजूद लोगों की यही मानसिकता है कि लड़कियों को ज्यादा पढ़-लिखकर क्या करना है। लोग लड़कियों को घर के काम-काज में ही लगाए रखते हैं। दूसरे कुछ धनसंपन्न घरों के लोग अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते भी हैं, तो इंग्लिश का बोलबाला होने की वजह से इंग्लिश स्कूल में ही एडमिशन कराना प्रिफर करते हैं। इसलिए पूरे सिस्टम को सुधारने की बेहद जरूरत है।

भारत में एजुकेशन

-22 करोड़ स्कूली बच्चों में से 20 करोड़ से भी ज्यादा कॉलेज नहीं जा पाते।

-10 प्रतिशत ग्रेजुएट्स ही अच्छी जॉब के योग्य होते हैं।

-75 फीसदी स्टूडेंट्स के पास कॉलेज की फीस जमा करने के पैसे नहीं होते।

-आजादी से पहले 20 यूनिवर्सिटीज और 500 कॉलेजेज थे। आज 545 यूनिवर्सिटीज और 45 हजार कॉलेजेज हैं।

कॉन्सेप्ट ऐंड इनपुट : मिथिलेश श्रीवास्तव, अंशु सिंह, मो. रजा और राजीव रंजन

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