हिंदुस्तान का सबसे बड़ा किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत
हिंदुस्तान का सबसे बड़ा किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत
हिंदुस्तान का सबसे बड़ा किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत
हिंदुस्तान का सबसे बड़ा किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत

हिंदुस्तान का सबसे बड़ा किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत

हाल खचाखच भरा था और खच उससे कहीं ज्यादा थी… जिसे देखो वही माइक पकड़ कर नेता हो जाना चाहता था, लेकिन माइक से ही नेता बनते तो फिलिप्स कम्पनी का मालिक एक भी माइक न बेचता और सबसे बड़ा नेता खुद बन जाता। बहरहाल वाकया कुरुक्षेत्र की जाट धर्मशाला का है। एक संजीदा मसले पर खापों की महापंचायत बुलाई गई थी। इस बैठक में जाट समाज के कई बड़े लोग और खापों के प्रधान मौजूद थे। अलबत्ता बदइंतजामी इतनी की जिसे माइक फंस जाए वही वक्ता हो जाए। किसी कोने से नारे लग जाएं और कोई कुछ भी चिल्लाने लग जाए। इस बीच सिर पर गांधी टोपी लगाए और सिलवटों वाली धोती पहने करीब सवा छह फुट लम्बा एक शख्स उठा और उसने बिना माइक लिए ही इतनी जोर से सबको हड़काया कि दो हजार से ज्यादा की सभा में सन्नाटा पसर गया। माइक के इर्द-गिर्द मंडरा रहे लोगों को सांप सूंघ गया। ‘रै इतनी बड़ी तो सभा भी नहीं ये जिसे समझाया न जा सकै… के चर्र-चर्र लगा रखी थमनै! टिक के बैठ जो सारे… ढंग की बात करो अर ढंग तै सुनो! इतना कह कर यह शख्स बैठ गया और बहुतों की खुरापात को ले बैठा। पूरी सभा अनुशासन में आ गई। यह शख्स हिंदुस्तान का सबसे बड़ा किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत था। दरअसल नेता बना या बनाया नहीं जाता, नेता पैदा होते हैं। किसानों और मज़लूमों की आवाज बुलंद करने वाले टिकैत की हस्ती में मेरी शुरू से आसक्ति रही। लिहाजा बैठक का पहला दौर खत्म होने के बाद मैंने महेंद्र सिंह टिकैत को खोजना शुरू किया। वो नीचे उतर आए थे। मैंने उनको जाट धर्मशाला में कई जगह खोजा, वीआईपी कमरों में, प्रबंधकों के ऑफिस में, बड़े-बड़े चौधरियों की मंडलियों में और हुक्का गुड़गुड़ा रहे कई तुर्रम खां टाइप के लोगों के बीच भी मैं गया, लेकिन वो तांबई से मुखड़े वाला व्यक्ति कहीं नहीं था। फिर मैंने पश्चिमी उत्तरप्रदेश की बोली के लहजे का हिसाब लगाकर एक व्यक्ति को टोका। उसने कहा ‘महात्मा टिकैत तो ये बैठे इंगहै…! मैं उसके पीछे हो लिया। हम जाट धर्मशाला के एक बड़े से कमरे में दाखिल हो गए। दरअसल यह धर्मशाला के अनाज का गोदाम था। टिकैत यहां अपने अनुयायियों से घिरे एक पुरानी सी दरी पर बैठे अपने साथ लाई हुई हुक़्क़ी गुड़गुड़ा रहे थे। मैंने राम-राम की औऱ पास जाकर बैठ गया। टिकैत की धोती में बेशुमार सिलवटें और कुर्ते में उतनी ही सफेदी, जितनी किसी किसान के कपड़ों में अमूमन होती है। माथे पर खिंची लम्बी और गहरी लकीरें मानो उनके संघर्ष के तमगे बन गई थीं। हुक्के के धुएं को खारिज करते मोटे से होंठ उनके ठेठ होने की गवाही दे रहे थे। मेरे साथ बातचीत में वे कई बार हंसे और अपने साथियों को भी हंसाया। दूसरे दौर की बैठक का बुलावा आया गया। टिकैत अपनी खादी की टोपी को सिर पर साधते हुए उठे और जूती पहनने लगे। उन्होंने करीब एक फुट लंबे और भारी पैर में एक जूती पहनी और दूसरे में एक पुरानी सी हवाई चप्पल। दरअसल उनके एक पांव में ठसक लगी हुई थी। मसलन वो जूती नहीं पहन पा रहे थे। उनका यह साधारण आचरण उनके व्यक्तित्व को असाधारण बनाता था। मैं उनके इस देसी अंदाज़ का कायल हो गया। असल में बनावट उनके आसपास नहीं थी। जो था, सो था।
दूसरा वाकया 17 मई 2011 का है। हम 4 रोज के लिए बरेली के एक जंगल में पृथकवास में थे। वापसी में बरेली शहर पहुंचे तो दुनियादारी की खबर जानने की तलब में दैनिक जागरण लिया। पहले पन्ने की खबर ने स्तब्ध कर दिया, ‘किसानों के मसीहा टिकैत का निधन’। मैं अवाक रह गया। मैं डॉ. तारा चन्द शर्मा के साथ गाड़ी में था। वो ड्राइव कर रहे थे और मैं हाथ में अखबार लिए रुआंसा बैठा था। टिकैत के प्रति उनकी भी आस्था मेरे जितनी ही थी। टिकैत के बारे में कुछ और पढ़ने की तलब में मैंने अखबार के पन्ने पलटे। सम्पादकीय पृष्ठ पर टिकैत के अनुयायी और मेरे पसंदीदा कवि डॉ. हरिओम पंवार का लेख छपा था। मैंने रुंधे गले से लेख बोल कर पढ़ना शुरू किया। पंवार ने उस दिन टिकैत को श्रद्धांजलि लिखते हुए कलम तोड़ दी थी। लेख खत्म होते-होते हम दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा तो हमारी आंखों में आंसू थे। हम मुरादाबाद को पार कर चुके थे। डॉ. तारा चन्द ने कहा टिकैत के घर चलें? मैंने कहा, बिल्कुल। हम सिसौली पहुंच गए। एक बड़ा सा गांव! पता पूछते ही एक आदमी ने कहा, महात्मा टिकैत तो जा लिए भाई कल! उस इलाके में उन्हें महात्मा टिकैत भी कहा जाता था। हम एक बड़ी सी बैठक में पहुंचे, लेकिन वहां सन्नाटा था। केवल एक आदमी मौजूद था। हम राम-राम करके बैठ गए। उसने बताया कि ये भारतीय किसान यूनियन का दफ्तर है। ये महात्मा टिकैत की कुर्सी! यह कहते हुए वह भावुक हो गया। फिर वह चारदीवारी से घिरे एक बड़े से मैदान में ले गया, जोकि भारतीय किसान यूनियन का ही मैदान था। उसने राख की एक छोटी सी ढेरी की तरफ इशारा करते हुए कहा यहीं महात्मा टिकैत का संस्कार किया गया और सामने चौधरी चरण सिंह जी की मूर्ति है। यहीं महात्मा टिकैत की समाधि बनेगी। फिर उसने हमें टिकैत के पशुओं के बाड़े में उनके बैलों की जोड़ी और पास रखा हल दिखाते हुए कहा कभी-कभी जोत लेते थे अभी भी। इस वार्ता के बाद हमारा वहां रुकने का कोई प्रयोजन नहीं रह गया था। हमने राम-राम करके वापसी के लिए कदम बढ़ाए, तो वो बोला कि कहां चले? हमने कहा चलते हैं भाई साहब। दादा टिकैत की कर्मभूमि के दर्शन कर लिए। उसने कहा आपको घर चलना पड़ेगा। हमने ना कह दी। उसने धक्का किया और पास में ही टिकैत के घर ले गया। रास्ते में उसने बताया कि आज सैकड़ों गाड़ियों का काफिला महात्मा टिकैत की अस्थियां लेकर हरिद्वार गया है। इसलिए यहां बस कुछ बुजुर्ग ही बैठे हैं। एक बहुत बड़ी सी बैठक में भारी भरकम पावे वाली चारपाइयों पर जमे बुजुर्ग हुक्का गुड़गुड़ाते हुए महात्मा टिकैत के किस्से दोहरा रहे थे। उनमें से एक ने कहा, ‘खाना लाओ रै यें छोरे आए हरियाणे तै। हमने कहा खाना तो हम खा कर आए हैं और खाने का तो अब इस मौके पर क्या? इतना सुनते ही हुक्के के धुएं से मूछें पीली कर बैठे एक बुजुर्ग ने रौबदार आवाज में कहा, क्या हुग्या महात्मा टिकैत हर भी कोई मरया करै के? ओ तो देवता था भाई… रहन्दी दुनिया तक याद करया जावेगा। इतने में हमारे सामने लस्सी के बड़े-बड़े गिलास और थाली में गुड़ की डलियां आ गई। लस्सी के साथ गुड़ खाकर हमने उस सभा से विदा ली। मैंने अपने आप से कहा, राजेश चौहान… तू यूं ही उस खांटी आदमी का मुरीद नहीं हो गया था। वो वास्तव में नेता पैदा हुआ था और नेता कभी मरता नहीं। पुण्यतिथि पर महात्मा टिकैत आज बहुत याद आए। सही मायनों में किसान, मज़दूर और मज़लूमों के मसीहा!

https://www.livehindustan.com/uttar-pradesh/amroha/story-farmer-leader-mahendra-singh-tikait-remembered-on-his-death-anniversary-3216145.html

https://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=47843

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