आजादी के बाद देश में बनी विभिन्न सरकारों ने देश में सैंकड़ों योजनाएं लागू की ! हर योजना में प्रत्येक सरकार का उद्देश्य देश की आम जनता की उन्नति ही होता है ! लेकिन फिर भी देश के लोगों का भरोसा सरकारों की योजनाओं से उठ चुका है ! कोई भी योजना ऐसी नहीं होती जिसको सुन के आम जनता में उत्साह दिखे ! ऐसा इसलिए क्योंकि देश के लोगों का अनुभव कहता कि कोई भी योजना आम जनता को कम, सरकारी अधिकारियों को ज्यादा फायदा पहुँचाती है ! और सत्य भी यही है ! किसी योजना में लागू होने से पूर्व शोध की कमी और लागू होने के बाद पारदर्शिता की कमी किसी भी योजना की असफलता का कारण है ! चलिए हम एक योजना पर चर्चा करते हैं ! ” प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना “इस योजना पर प्रदेश के किसान नाराज नजर आ रहे हैं ! सरकार ये भी कह सकती इस कि योजना के विरोध में किसानों के छुटमुट प्रदर्शन विपक्ष की राजनीति है ! लेकिन क्या हरियाणा सरकार खुद्द इस बात से संतुष्ट है कि इस योजना से किसान खुश हैं ! जितनी हमारी जानकारी है और राजनीति से दूर रहने वाले किसानों से हमारी बात हुई तो इस योजना को लेकर सभी किसानों में नाराजगी नजर आती है !इसका कारण है इस योजना को लागू करने से पूर्व जो शोध हुआ उस में बाबुओं का आलस साफ नजर आता है ! और दूसरी तरफ इसमें सरकार ने योजना को बनाते हुए किसानों का लाभ नही अपनी परेशानी को दूर करने को प्राथमिकता दी ! किसी भी क्षेत्र में जब अधिक बरसात या सूखे से किसानों की फसल खराब होती थी तो मुआवजा देना सरकार की बड़ी समस्या होती थी ,अपनी इस समस्या को दूर करने के उद्देश्य से सरकार ने ये योजना लागू कर दी ! नही लगता कि सरकारी अधिकारियों ने निष्पक्ष शोध करके सरकार को बताया होगी कि कितने किसानों की फसल वार्षिक खराब होती है और किसान कितनी वार्षिक क़िस्त देंगे ! और अगर सरकार को बताया भी होगा तो सरकार ने अपनी सिरदर्दी दूर करने के लिए इस योजना को लागू कर दिया! मेरा दूसरा सवाल ये है कि क्या सरकार को देश के किसी भी नागरिक से उसके सहमत होने न होने का अधिकार छीनना चाहिए वो भी उस मुद्दे पर जो सीधा उसके घर को प्रभावित करे !किसान जब बैंक में पहुँचता है तो उसे पता चलता है कि उसके खाते से फसल बीमे की क़िस्त के पैसे बैंक ने काट लिए ! उस से ये भी नही पूछा गया के वो बीमा कराना चाहता है या नही ! उसकी फसल का बीमा कर दिया गया ! क्या उसे अधिकार नही ये सोचने का, कि ये बीमा कराऊँ या नहीं ! जब वो बैंक में जाता है तो बस ठगा सा महसूस करता है ! ये भी हो सकता कि यह योजना किसान के हित में हो ,और इस योजना के समर्थक ये तर्क भी दें कि किसान की सहमति इसलिए नहीं ली गयी के किसान में इस योजना के लाभ को समझने की योग्यता नही ,यह बात ठीक भी हो सकती है! लेकिन गलत न हो, इसकी जिम्मेदारी कोई ले सकता है ,क्या वो अधिकारी जो एक गमले में गेहूं उगाकर एक हेक्टेयर की औसत निकाल देते हैं !अगर उनके आंकड़े आज तक 10% भी सही होते तो किसान से उन्नत वर्ग देश में कोई न होता !और अगर किसान सरकार की योजना को समझने में सक्षम नही तो जिम्मेदार कौन है किसान ,या विभिन्न पार्टियों की सरकारें !फिर सरकारों की गलती का भुगतान किसान क्यों करे !क्या सरकार की ये जिम्मेदारी नही कि किसान को जागरूक करे और जब तक सरकार ये न माने कि अब किसान जागरूक हो गया है , तब तक अपनी समस्या को दूर करने के लिए किसान पर एक तरफ़ा फैसले न थोपे !और ये अकेली सरकार नहीं जिसने किसान से उसका अधिकार छीना! हर सरकार ने किसान को मुर्ख समझा और उससे बिना पूछे किसान के घर के फैसले कर दिए ! क्या यही है किसान हित !

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